🌙 सोलह सोमवार व्रत कथा – भगवान शिव के चमत्कारों से भरी दिव्य कथा

By JayGuruDev

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Solah Somvar Vrat Katha – blessings of Lord Shiva and Parvati

एक समय की बात है। भगवान भूतनाथ (शिवजी) अपनी प्रिया माता पार्वती के साथ संसार भ्रमण के लिए निकले। घूमते-घूमते वे विदर्भ देश की अमरावती नगरी पहुँचे। नगर की पवित्रता और सुंदरता देखकर वे प्रसन्न हुए और एक सुंदर शिवालय में ठहर गए।

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⭐ पार्वती जी और शंकर जी का चैसर खेल

एक दिन माता पार्वती की इच्छा चैसर खेलने की हुई। दोनों चैसर खेल रहे थे कि तभी शिवालय का पुजारी वहाँ पहुँचा।
पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए पूछा—
“ब्राह्मण! बताओ, इस बाजी में कौन जीतेगा?”
पुजारी ने बिना सोचे उत्तर दिया—
“भगवान शंकर ही जीतेंगे।”

लेकिन थोड़ी देर बाद बाजी माता पार्वती जीत गईं।
यह देखकर माता क्रोधित हुईं और ब्राह्मण को बिना सोचे उत्तर देने के लिए कोढ़ी होने का श्राप दे दिया।
भगवान शंकर ने बहुत समझाया, पर माता पार्वती नहीं मानीं।

ब्राह्मण कोढ़ से पीड़ित होकर अत्यंत दुःखी रहने लगा।


⭐ अप्सराओं का आगमन और सोलह सोमवार व्रत का महत्व

काफी समय बीत गया। एक दिन देवलोक की अप्सराएँ शिवालय में आईं। ब्राह्मण को कोढ़ से पीड़ित देखकर उन्हें दया आई।

उन्होंने कहा—
“तुम सोलह सोमवार का विधिपूर्वक व्रत करो। भगवान शंकर अवश्य तुम्हारे दुख दूर करेंगे।”

👉 व्रत की विधि

  • सोमवार को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
  • आधा सेर गेहूं का आटा लेकर 3 अंगियाँ बनाएँ
  • घी, गुड़, दीप, नैवेद्य, बेलपत्र, चंदन, पुष्प आदि से भगवान शिव की प्रदोष काल में पूजा करें
  • एक अंगी भगवान को, एक प्रसाद के रूप में बाँटें, एक स्वयं ग्रहण करें
  • सोलह सोमवार पूर्ण होने पर सत्रहवें सोमवार चूरमा बनाकर भोग लगाएँ

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⭐ ब्राह्मण का रोगमुक्त होना

ब्राह्मण ने पूरे नियम से व्रत किया।
भगवान शिव की कृपा से वह कोढ़ से मुक्त हो गया और पुनः सुखी व समृद्ध बन गया।

कुछ समय बाद शिव–पार्वती दोबारा उस शिवालय में आए।
पार्वती जी ने ब्राह्मण को स्वस्थ देखकर आश्चर्य व्यक्त किया।
जब उन्हें पता चला कि सोलह सोमवार व्रत से चमत्कार हुआ है, तो उन्होंने भी अपने रूठे पुत्र कार्तिकेय को मनाने के लिए व्रत किया।


⭐ व्रत के प्रभाव से बनी शुभ घटनाओं की श्रृंखला

✔ कार्तिकेय रुष्टता छोड़कर आज्ञाकारी बने

✔ कार्तिकेय के मित्र ने भी व्रत किया

राजकुमार स्वयंवर सभा में गया। वहाँ राजा ने घोषणा की थी—
“जो युवक राजकुल की हथिनी की जयमाला प्राप्त करेगा, उसी से राजकुमारी का विवाह होगा।”

हथिनी ने उसी ब्राह्मण कुमार के गले में माला डाल दी और उसका राजकुमारी से विवाह हो गया।


⭐ राजकुमारी ने पुत्र प्राप्ति हेतु व्रत किया

कई वर्षों बाद, पुत्र-इच्छा से राजकुमारी ने भी सोलह सोमवार का व्रत किया।
भगवान शिव की कृपा से सर्वगुण सम्पन्न पुत्र प्राप्त हुआ।


⭐ राजकुमार ने राज्य के लिए व्रत किया

जब युवक बड़ा हुआ और उसे ज्ञात हुआ कि उसका जन्म सोलह सोमवार व्रत का फल है, तो उसने राज्य प्राप्ति के लिए व्रत किया।
व्रत पूरा होते ही उसे दूसरे राज्य की राजकुमारी के लिए वर चुन लिया गया और विवाह के बाद वह राजा बन गया।


⭐ भविष्यवाणी और रानी का वन-बदर होना

राज्य मिलने के कुछ समय बाद भविष्यवाणी हुई—
“या तो रानी को त्याग दो या राज्य खो दोगे।”

मजबूरी में राजा ने रानी को त्याग दिया।

भटकती हुई रानी को कोई आश्रय नहीं मिला—

  • सूत बेचने वाली बुढ़िया ने निकाल दिया
  • तेली के घर सब बर्तन टूट गए
  • लोग उसे दुत्कारते रहे

अंत में एक ग्वाले ने उसे शिवालय के गुसाई के पास पहुँचा दिया।
गुसाई ने उसे आश्रय दिया, पर रानी जो भी छूती वह बिगड़ जाता।
गुसाई ने कारण जानकर उसे सोलह सोमवार व्रत करने का आदेश दिया।

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⭐ पुनर्मिलन और पुनः राज्य

रानी ने व्रत पूर्ण किया।
उधर राजा को स्वप्न में रानी का संकेत मिला।

राजा के दूतों ने रानी को खोज निकाला।
गुसाई जी ने पूरी कथा सुनकर उन्हें मिलवा दिया।

राजा–रानी जब राजधानी लौटे तो पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया।
उन्होंने प्रजा के हित के कार्य किए और भगवान शिव की कृपा से दीर्घ समय तक सुखपूर्वक राज्य किया और अंत में शिवलोक को चले गए।


🕯 अथ सोमवार की आरती

आरती करत जनक कर जोरे ।
बड़े भाग्य रामजी घर आए मोरे ।। टेक ।।

जीत स्वयंबर धनुष चढ़ाए
सब भूपन के गर्व मिटाए ।।

तोरि पिनाक किए दुइ खण्डा ।
रघुकुल हर्ष रावण भय शंका ।।

आई हैं सिय संग सहेली ।
हरष निरख वरमाला मेली ।।

गज मोतियन के चैक पुराए ।
कनक कलश और भरि मंगल गाए ।।

कंचन थाल कपूर की बाती ।
सुर नर मुनिजन आए बाराती ।।

फिर भाँवरि बाजा बजै
सिया सहित रघुबीर विराजै ।।

धन्य-धन्य राम लखन दोऊ भाई ।
धन्य-धन्य दशरथ कौशल्या माई ।।

राजा दशरथ जनक विदेही ।
भरत शत्रुघ्न परम सनेही ।।

मिथिलापुर में बजत बधाई ।
दास मुरारी स्वामी आरती गाई ।।

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